my blog is mutiny against all conventional old things , which is a baggage to a common man .hence it is my voice against all untruthful things happening in the society .
Sunday, January 31, 2010
मैं आम आदमी हूँ आओ मुझे मारो
मैं आम आदमी हूँ , मैं किसी पार्टी का दिया हुआ नाम नहीं हूँ , मैं तब से हूँ जब से दुनिया बनी , मैं गवाह हूँ दुनिया के बनने , उसके आगे बढ़ने और उसके अभी तक के सफ़र का ,और मैं गवाह रहूँगा तब भी जब ये दुनिया ख़तम हो रही होगी , मैं तब भी था जब रामायण हुई , मैं तब था जब महाभारत हुआ , मैं दोनों विश्व युध का गवाह भी रहा हूँ , मैंने भारत का बटवारा भी देखा है , और उसके बाद की त्रासदी को भी देखा है , मैंने देखा बापों को अपनी ही बेटियों का सर कलम करते हुए , मैंने देखा है लाखों की संख्या में लोगों को गैस चैम्बर में घुट -घुट कर मरते हुए , और मैं आज भी गवाह हूँ उन सब त्रासदियों का ,आतंकवादी घटनाओ का , और बहुत कुछ का जो घट रही हैं , क्योंकि मैं ही हूँ जिसने ये सब झेला है , और झेल रहा हूँ , फिर भी अनजान हूँ , कोई मुझे नहीं जानता, कोई मेरी परवाह नहीं करता . इतना कुछ झेलने के बाद मेरे मन में कुछ सवाल हैं .
जब महाभारत हुआ हममे से कुछ ने पांडवों का साथ दिया , कुछ ने कौरवों का साथ , पता नहीं कितने करोणों लोग मरे गए , अगर पांड्वो ,कौरवों को जमीन के लिए लड़ना था थो खुद कहीं कट मरते ,हमें क्यों शहीद किया ,जब विश्व युद्ध हुए तब भी हम ही थे जिसने खोया , हमारे माँ -बापों ने अपने बेटों को खोया , हमारे बच्चों ने अपने बापों को खोया , हमारी बीबियों ने अपने पतियों को खोया . किसी एक सनकी की सनक से हम गैस चैम्बरों में झोक दिए गए , कुछ की सनक से बटवारा हुआ तब भी हम ही थे जिन्होंने सबसे ज्यादा झेला ,माओं ,बहनों की इज्जत लूटी गयी , बापों ने अपने ही बेटियों के , पतियों ने बीबियों के सर कलम कर दिए ,ताकि उन्हें उस वहसीयत का शिकार ना होना पड़े , इन सब में हमारी क्या गलती थी , अब भी हमारी क्या गलती है जब कोई लाल झंडा लेकर कोई काला , कोई भगवा लेकर ,कोई धरम के नाम पर ,कोई भाषा के नाम पर कोई छेत्र के नाम पर तो कोई बिना किसी नाम पर हमे अपना शिकार बना रहा है , मैं हजारों साल पहले भी आश्चर्य में था ,अब भी हूँ , मुझे आज तक समझ नहीं आया की मेरी गलती क्या थी , और अब भी मेरी गलती क्या है ? लेकिन फिर भी मैं था , हूँ , रहूँगा .
Friday, January 29, 2010
हाय ये गरीबी
हम सब २१ वी सदी के भारत में हैं , ये भारत एक तरफ तो हमे एक गर्व महसूस करता है , दूसरी तरफ ये सवाल भी खड़ा करता है , क्या हम उस मुकाम तक पहुच पाएं हैं की हम ग्रवान्वित हो सकें , मैं उन लोगों की बात कर रहा हूँ , जिनके बारें में बात तो सभी कर रहे हैं ,आवाज़ भी उठा रहे हैं , पर ये कैसी आवाज़ है की उन कानो तक नहीं पहुच पा रही जिनकी हम बात कर रहे , ये है वो गरीब आदमी जिसे ना भारत उदय का पता है , ना अस्त का ,उसे ना उनका पता है ,जो उनकी बात कर के वोट मांगते हैं ,या फिर ना उनका पता है जो उनकी वजह से लोगों को मारते हैं , ना उनका पता है जो टी.वी पर बैठ कर ,अख़बारों में , ब्लॉग पर उनके बारे में बात करते हैं ,अरे उसे तो अपने जीने मरने का पता नहीं है , ये सवाल सब करते हैं की "हाय ये गरीबी " ,पर ये गरीबी का सवाल भी शायद उन्ही तक सीमित है क्योंकि जवाब अभी तक मुझे नहीं मिला . मैं आप सभी से घटना को बाटना चाहूँगा .मैं एक दिन नगर बस से अपने कॉलेज जा रहा था ,तभी कुछ मजदूरों ने उस बस को रोका और पूछा भैया फैजाबाद जाओगे , मैंने उन्हें ध्यान से देखा उनकी आँखें बड़ी आश्चर्य में थी ,उन्हें समझ में नहीं आ रहा था की क्या करें , उन्हें तो शायद ये भी नहीं पता था की ये फैजाबाद है कहाँ ,ये ऐसे गरीब थे जिन पर अभी ना कोई सरकार पहुची है ना कोई ऐन जी ओं पंहुचा ना कोई टी वी चैनल और ना कोई और उनकी जिन्दगी का मकसद केवल पेट भरना है , अब अपने आप को उस जगह रख कर देख लीजिये , मतलब समझ आ जायेगा गरीबी का , मैं बहुत अच्छा लेखक नहीं हूँ शायद सही से लिख नहीं पा रहा , वैसे भी मेरा मकसद दो आंसू गिरवाकर वाह- वाही लूटना नहीं है मेरी दरख्वास्त तो बस इतनी सी है की केवल सवाल ना पूछिए , उसके जवाब भी खोजने की कोशिश करिए .
Saturday, January 23, 2010
कांग्रेस एक सेकुलर पार्टी नहीं है
बहुत दिनों से एक शब्द जो मेरे दिल के काफी करीब है " सेकुलर " के बारे में कुछ लिखना चाह रहा था , दरसल मैं ये बात पूरे विश्वास और दृढ़ता से कह रहा हूँ की भारत देश में लगभग सभी सांप्रदायिक हैं , अब जो लोग सीना ठोक कर अपने आप को सेकुलर कहते नज़र आते हैं वो कहेंगे आप ये कैसे कह रहे हैं , तो मेरे हिसाब से सेकुलर वो है जो धरम , जाति के हिसाब से एक दूसरे में कोई अंतर ना करता हो , जिसे दूसरे धरम के लोगों से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध बनाने से कोई परहेज ना हो और धरम उसके लिए मात्र इश्वर में आस्था का जरिया भर हो . और संविधान में जो परिभाषा दी गयी है वो एक दम गलत है , संविधान में परिवर्तन की आवश्यकता है . अब आते हैं कांग्रेस पर सबसे ज्यादा यही लोग सेकुलर नामक शंख बजाया करते हैं , ये लोग सबसे बड़े साम्प्रदयिक हैं , अगर भाजपा सांप्रदायिक है तो उसी सिक्के के दूसरे पहलू ये भी हैं , मेरा मानना है की कोई भी सेकुलर व्यक्ति अपना डंका नहीं पीटता जैसे ये पीटते हैं , लोग सामन्यता सेकुलरिस्म को हिन्दू -मुस्लिम धर्मों से जोड़ते हैं , और मुझे ये भी लगता है की लोग यहाँ बहुत जल्दी भूल भी जाते हैं , याद करिए १९८४ के सिख दंगे इनके पीछे किसका हाथ था , क्या कांग्रेस के लोग इसके पीछे नहीं थे , ३ दिन हमारी देश की राजधानी में किस तरह दंगो का नंगा नाच हुआ ये हमे मालूम हैं , और दंगा पिरितों के साथ इन्साफ हुआ ? नहीं -नहीं हुआ . इस बात की क्या गारंटी है की ये लोग समय आने पर फिर ऐसा नहीं करेंगे , पूरे देश को सिख संप्रदाय का शुक्रिया अदा करना चाहिए की वो इस जख्म को लेकर भी आगे बढ़ गए , वर्ना सिख आतंकवाद भी हमारे सामने खड़ा होता . अब बारी आती है हमारे गृह मंत्री की मिस्टर पी चितंबरम की बारी पहले कई दिनों से मैं उनके मुह से हिन्दू आतंकवाद की काफी चर्चा सुन चुका हूँ , क्या ये हमे बता सकते हैं की ये देश के किस हिस्से में पनपा है हम भी तो जाने . मैं उनको एक सलाह भी देना चाहूँगा की ऐसा करना बंद करिए वर्ना कोई हिन्दू आतंकवादी कहीं आपको ही शिकार ना बना ले , मेरा कहने का मतलब सिर्फ इतना है हिन्दू आतंकवाद जैसे कोई चीज अभी तक तो नहीं है पर आप ऐसा क्यों चाहते हैं की ऐसा हो , यहाँ लोगों को भरकाने वालों की कमी नहीं है कृपा करके ये प्रोपोगंडा बंद करिए .कांग्रेस को मेरी सलाह बस इतनी है की सेकुलर बोल के मत बनिए ये आप के बस की बात नहीं . इसके आलावा आप के पास कई मुद्दे हैं उनपर काम करिए . सेकुलर होना आपके बस की बात नहीं . मैं ये इस लिए भी कह रहा हूँ क्योंकि धर्म की बात कर लोग बहक जल्दी जाते हैं , चाहे वो सेकुलर हो या सांप्रदायिक .
बचपन
एक छोटे बच्चे के बारे में सोचिये , अच्छा अपने बचपन के बारे में सोचिये , बचपन में आप क्या बनाना चाहते थे , सुपर मैन
ही -मैन , हनुमान जी , बस आँख बंद करते थे और उड़ जाते थे अपनी ही दुनिया में . अपने माँ , बाप , बहन , भाई सबके दुखों को दूर कर देते थे , जो घर में नहीं होता था , वो सब हमारे सपने में होता था . टाफियों और चॉकलेट्स का तो भरमार होता था , खूब चाव से खाते थे हम उन्हें , और सोचते थे की बड़े होने पर अपने घर में ही दुकान रखेंगे जब मन किया खा लिया . अब सोचिये
क्या वो बच्चे जो कश्मीर में , पाकिस्तान में , गज़ा पट्टी , अफ्रीका में रहते हैं उनके सपने भी हमारे जैसे होते होंगे , हाँ वो भी हमारे जैसा ही सोचते होंगे . सपने हमारे भी टूटते हैं उनके भी, पर अंतर कहाँ है अंतर है की जब हम बड़े हुए हमे अपने माँ बाप , भाई बहन का साथ मिला , उनमे से कुछ खुश नसीब ही होंगे जिन्हें ये सब नसीब होता होगा , जब हम बड़े हुए सुपर मैन तो नहीं पर पर मैन तो बन ही गए , वो क्या बन पाए ये तो उन्हें भी नहीं पता . जब सपने टूटते हैं तो बहुत दुःख होता है , उनके सपने टूटने में तो उनका भी दोष नहीं था , बस दोष इतना की गलत टाइम पर गलत जगह पैदा हो गए , जब बच्चे, बच्चे होते हैं अगर उन्हें पता हो की आगे चलकर उनका भविष्य ऐसा होने वाला है शायद वो जीने से ही मना कर दें , अब दिमाग में आता है की इसका जिम्मेदार कौन है ,तो मेरे दिमाग में आता है की जिम्मेदार हम हैं , हमने आँख जो बंद कर ली है दूसरे का घर में आग लगी तो हमे उससे क्या , ये नहीं सोचा की उसमे भी ऐसे ही छोटे छोटे बच्चे होंगे . बड़ा होना इतना खतरनाक होता है , मुझे बड़ा आश्चर्य होता है , इतनी दीवारें खड़ी कर दी हैं हमने की हम खुद दीवार के उस पार नहीं देख पाते .शायद अब हमने आँखें बंद करना बंद कर दिया है , सपने देखना बचपना लगता है , या हम डरने लगें हैं , टूटने का डर जो है अरे भाई इसके पैसे थोड़े लगते है , अपने बचपन को याद करो , या अपने बच्चों को ही देख लो शायद सपने देखना आ जाये , क्योंकि ये सपने भी कहीं ना कहीं हमने कुछ सिखाते हैं , अपनी दीवार से दूर ले जाते हैं, कर के देखो बड़ा आराम मिलेगा और जवाब भी .
Monday, January 18, 2010
एक बच्ची की अद्दभुत कहानी और हमारे लिए कुछ.
आज कुछ सोचते सोचते अचानक एक कहानी याद आ गयी तो मैंने सोचा की चलो इसे अपने देश वासियों के साथ बाटूँ .

दरसल ये कहानी है एक नौ साल की एक अमेरिकन लड़की की है जो पोलियो ग्रस्त थी , अपने साथियों को स्कूल में दौड़ प्रतियोगिता में भाग लेते देखा तो अपने स्कूल के स्पोर्ट्स टीचर से कहा की मैं भी इस दौड़ में हिस्सा लेना चाहती हूँ , टीचर ने बिना कुछ सोचे समझे उससे कहा की अगर तुम दौड़ना चाहती हो तो तुम दौड़ो , वो लड़की दौड़ी और आखरी आई , फिर भी वो दौड़ना चाहती थी तो उस टीचर ने उसे मना नहीं किया और कई बार दौड़ प्रतियोगिता में भाग लेने के बाद जानते हैं उस लड़की ने उन्नीस साल की उम्र में क्या हासिल किया , वो ओलंपिक्स (१९५८) में दौड़ी और चार स्वर्ण पदक जीते , यही कारनामा उसने फिर से १९६२ में दोहराया , अब आप सोच रहे होंगे वो सामान्य व्यक्तियों का ओलंपिक्स नहीं होगा तो आप गलत हैं उसकी प्रतियोगिता आप हम जैसे सामान्य लोगों से ही थी .
अब आप सोच रहे होंगे आखिर मैं आपको ये क्यों बता रहा हूँ , तो चलिए मैं बताता हूँ .
कारण नंबर एक सोचिये उनके माँ - बाप कैसे होंगे की अपनी बिटिया को पोलियो होते हुए भी दौड़ने दिया , अब भारतीय होते हुए हम आप , या हमारे माँ बाप क्या करते ?
दूसरा वो स्कूल टीचर कैसा होगा जो ये जानते हुए भी की वो लड़की दौड़ कर जीत नहीं सकती फिर भी दौड़ने दिया , हम आप क्या करते ?
अब वो लड़की जो बार - बार हारती थी फिर भी हार नहीं मानती थी . अब एक भारतीय होते हुए क्या हममे भी ऐसे लोग हैं जो ऐसा सोच सकते है , या ऐसा करने का साहस कर सकते हैं ?
अब सोचिये हम इतना पीछे क्यों हैं ?
चलिए मैं बताता हूँ , जो मैंने यहाँ देखा है , माँ -बाप के रूप में क्या हम ऐसा सोच सकते हैं , शायद नहीं हम यहाँ पर उसे समझाने लगते की तुम नहीं दौड़ सकते , आदत हैं ना हमारी निरीह दिखने की .
हमारे टीचर होते तो शायद डाट के ही भगा देते .
और उस लड़की जैसे भी हमारे यहाँ एक भी नहीं है वरना हम सौ अरब की आबादी के देश में ओलंपिक्स में एक भी स्वर्ण पदक नहीं ला पाते .
अब कई लोग कहेंगे भारत एक गरीब देश है यहाँ पर लोग रोटी ही खा ले बड़ी बात , लो कर दी ना भिखारी वाली बात ! हम इतने कमजोर और निरीह क्यों हैं ?
दूसरा हमारे देश की काफी बड़ी आबादी गरीब है , लेकिन काफी बड़ी आबादी में लोग पैसे वाले भी हैं , उनमे से कोई क्यों नहीं आगे बढ़ता और देश का नाम रौशन करता ?
हमे पैसे से अमीरी का पता नहीं पर ये पता है की भारत में लोगों को दिमाग से काफी अमीर बनना है ,
सोचिये
Sunday, January 17, 2010
खेल और भारत
काफी दिनों से कुछ लिख नहीं पाया था , आज वक़्त मिला तो समझ नहीं आ रहा था की क्या लिखूं , फिर एक महानुभाव के ब्लॉग को पढ़ा तो समझ में आ गया की क्या लिखना है , जब मैं उनके ब्लॉग को पढ़ रहा था तो मुझे लगा की आवाज इनकी नहीं पूरे हिंदुस्तान की है , और फिर ये भी लगा की हमारे देश की आवाज इतनी गलत कैसे हो सकती है , दरसल मैं बात कर रहा हूँ अपने देश में खेल और खेलों की दुर्दशा के बारे में , वो हमारे यहाँ प्रसिद्ध कहावत है ना " पड़ोगे -लिखोगे बनोगे नवाब , खेलोगे कूदोगे बनोगे ख़राब " . दरसल बचपन से ही मुझे इस कहावत से चिढ थी , मुझे समझ नहीं आया हमारा देश ऐसा क्यों है . फिर यहाँ लोग कहते हैं की हम गरीब हैं ! हम गरीब क्यों हैं इसके बारे में कोई सोचा नहीं चाहता ? मैं ये कई लोगों से सुन चुका हूँ की अगले साल होने वाले कॉमन वेल्थ गेम्स इस गरीब देश के लिए फ़िज़ूल खर्ची है , हम अभी गरीब हैं हमे गरीबी हटाने पर ध्यान देना चाहिए , पर गरीबी हटाएं तो कैसे ? क्या जब हम इतनी बड़ी प्रतियोगिता करते हैं तो लोगों इससे रोजगार नहीं मिलता ? क्या हमारे देश में पर्यटन की बढोतरी नहीं होगी ?और क्या हमारे देश में जो खिलाडी अपनी जिन्दगी पर खेल कर इस देश का नाम रोशन कर रहे है वो इस देश के नहीं हैं , शायद हम ऐसा नहीं सोचते तभी १ अरब की आबादी वाले देश में ओलंपिक्स में एक स्वर्ण पदक आता है , वहीँ हमसे भी कई गुना गरीब देश केन्या ८ स्वर्ण पदक जीतता है ! अब क्या करें हम तो गरीबी हटा रहे हैं न कुछ न कर- कर , अरे भाइयों गरीबी खाली रोने से नहीं मिटेगी काम करने से मिटेगी , और अब खेल खेल नहीं हैं , इस बात को समझो, आगे बढ़ो , मेहनत करो .
Thursday, December 3, 2009
सेकुलर सब्द का अर्थ ये मीडिया वाले और ये राजनीतिज्ञ क्या जाने ?
मैं सेकुलर हूँ , मैं ये जानता हूँ , मुझे इसकी परिभाषा भी मालूम है , पर मुझे शक होता है की क्या इन मीडिया , और इन राजनीतिक पार्टियों को ये मालूम है , मुझे तो ऐसा नहीं लगता , और उनका ये सेकुलर बहुत ही खतरनाक है , कई बार महसूस होता है की ये मीडिया वाले ये नेता लोग किसी एक धरम के लोगों के निंदा करके और दूसरे धर्मों के गलत कामो को छिपा कर सेकुलर बनाना कहते हैं , जैसे की मालेगांव धामके के बाद मीडिया और कई राजनितिक दलों ने इसे भारत में हिन्दू आतंकवाद की शुरुवात बताई और कई बार हिन्दू आतंकवाद को नया खतरा बताने की कोशिस की , जैसे की मुस्लिम धरम को आतंकवाद से जोड़ा जाता है , ये बात अलग है की जयादातर मामलो में मुस्लिम ही ऐसे घटनाओ के पीछे होते हैं , तब ये कहा जाता है की मस्लिम धरम से इसका कोई नाता नहीं , और ये बात सही है , ये बात स्वयं ये मीडिया वाले , राजनितिक दल बार बार दोहराते रहते है , क्योंकि सेकुलर का तमगा जो लगाना है , पर ये बात उस समय कहा चली जाति है जब ये हिन्दू धरम को आतंकवाद से जोड़ने की कोशिस करते हैं . दरसल सेकुलर शब्द बहुत ही वृस्तित शब्द है , ये केवल उसके शाब्दिक अर्थ तक ही सीमित नहीं है , और ये बात इन गधे मडिया वाले और राजनीतिकों को समझ नहीं आएगी , सेकुलर का केवल ये मतलब नहीं है की सभी धरम के लोग एक सामान है और सभी अपने अपने धरम के अनुसार काम कर सकते हैं , ये अर्थ तब तक पूरा नहीं है जब तक लोग ये नहीं समझ जाते जिस तरह से वास्तविक समय मैं धरम अपनी कार्यप्रणाली चला रहे हैं उससे ज्यादातर आबादी सांप्रदायिक ही रहेगी , जब तक हम इंसान होते हुए भी धरम का नाम देकर अपने को अलग बताते रहेंगे तब तक सेकुलर प्राणी आपको ढूडने पर ही मिलेगा , इन मीडिया और इन राजनीतिज्ञों की क्या औकात की ये सेकुलर बन सके .
Wednesday, December 2, 2009
हिन्दू धरम और जाति नामक जहर
हिन्दू धरम और जातियों का एक दूसरे से चोली और का दामन नाता है ,ये एक दूसरे से इस ढंग से जुड़े हुए हैं की अगर कुछ भी अलग होने के कोशिश करेगा तो किसी न किसी का नंगा पन तो सामने आएगा ही , चलिए मैं आपको हिन्दू धरम में जातियों की उत्पत्ति और बाद में इसका परिवर्तित स्वरुप और इससे होने वाले परिणामों की चर्चा करूंगा . अगर कोई भी चीज मेरी बनाई लगे तो आप सब मुझे कह सकते हैं अगर नहीं तो कृपा करके मेरे पक्ष में ही लिखे दरसल मैं बहुत कट्टर हूँ .
जातियों का निर्माण कुछ ऐसे हुआ , कुछ हजारों साल पहले जब देश , राज्य जिले जैसे परिकल्पना नहीं थी तब गाँव अकेले मिलजुल कर अपनी जरूरतें पूरी करते थे , तो उन्होंने एक व्यवस्था बनाई की जिससे सही ढंग से काम चल सके.
वो व्यवस्था इस प्रकार थी .
जब भी किसी परिवार मैं कोई बच्चा पैदा होता तो उसके सामने सभी जरूरी काम के वर्गों के सामान रख दिए जाते और बच्चा जिस तरफ रुख कर देता वो काम उसका हो जाता और वो अपनी जिन्दगी उसी काम में समर्पित कर देता . ये एक निष्पक्ष प्रणाली थी ,तब परिवर्तन कैसे आये? कैसे ये प्रणाली इतनी दूषित कैसे हो गयी ? इसका उत्तर भी है मेरे पास .
जिन व्यक्तियों को पढने लिखने काम मिला उन्होंने समाज के साथ साजिश की उन्हें ये लगा की कैसे उनका पुत्र एक शूद्र का काम कैसे कर सकता है , समाज में बुद्धिमान होने के कारन उन्होंने व्यवस्था अपने हिसाब से मोड़ ली . तभी से इन जातियों का जन्म हुआ , तभी से पंडित का बेटा पंडित , वैश्य का बेटा वैश्य , शुद्र का बेटा शूद्र होने लग गया . और दुःख इस बात का है की आज इस पढ़े लिखे समाज में इन घटिया चीजों को सही ठहराया जाता है .
अब आज मैं क्यों इस विषय को उठा रहा हूँ , इससे होने वाले परिणामों के कारन .
परिणाम संख्या एक - जातीय बैर , उची जातियों , और नीची जातियों के बीच में लड़ाई .
उची जातियों के बीच आपस में लड़ाई ( जैसे पंडितों और ठाकुरों , ठाकुरों -ठाकुरों के बीच में लड़ाई )
और बहुत से कारन है जिन्हें बताने की जरूरत भी नहीं है . लेकिन इनसे भी जयादा परेशान करने वाली चीजें वो है जिसके कारन लोग इसका राजनीतक फायदा उठाकर समाज को तोड़ने की कोशिस कर रहे है , मैंने कहीं पढ़ा है , हर साल कुछ नीची जाति के लोग बौध धरम स्वीकार कर रहे हैं , कुछ लोग ईसाई धरम स्वीकार कर रहे हैं , मुझे इन धरम परिवर्तनों से कोई दिकत नहीं दिक्कत है तो सिर्फ वो कडुवाहट जो इसका कारन बन रहे हैं . और जो ये धरम परिवर्तन करवाते है वो इस जहर का फ़ायदा उठाते हैं . अब आप लोग समझदार हैं समझिये .
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जातियों का निर्माण कुछ ऐसे हुआ , कुछ हजारों साल पहले जब देश , राज्य जिले जैसे परिकल्पना नहीं थी तब गाँव अकेले मिलजुल कर अपनी जरूरतें पूरी करते थे , तो उन्होंने एक व्यवस्था बनाई की जिससे सही ढंग से काम चल सके.
वो व्यवस्था इस प्रकार थी .
जब भी किसी परिवार मैं कोई बच्चा पैदा होता तो उसके सामने सभी जरूरी काम के वर्गों के सामान रख दिए जाते और बच्चा जिस तरफ रुख कर देता वो काम उसका हो जाता और वो अपनी जिन्दगी उसी काम में समर्पित कर देता . ये एक निष्पक्ष प्रणाली थी ,तब परिवर्तन कैसे आये? कैसे ये प्रणाली इतनी दूषित कैसे हो गयी ? इसका उत्तर भी है मेरे पास .
जिन व्यक्तियों को पढने लिखने काम मिला उन्होंने समाज के साथ साजिश की उन्हें ये लगा की कैसे उनका पुत्र एक शूद्र का काम कैसे कर सकता है , समाज में बुद्धिमान होने के कारन उन्होंने व्यवस्था अपने हिसाब से मोड़ ली . तभी से इन जातियों का जन्म हुआ , तभी से पंडित का बेटा पंडित , वैश्य का बेटा वैश्य , शुद्र का बेटा शूद्र होने लग गया . और दुःख इस बात का है की आज इस पढ़े लिखे समाज में इन घटिया चीजों को सही ठहराया जाता है .
अब आज मैं क्यों इस विषय को उठा रहा हूँ , इससे होने वाले परिणामों के कारन .
परिणाम संख्या एक - जातीय बैर , उची जातियों , और नीची जातियों के बीच में लड़ाई .
उची जातियों के बीच आपस में लड़ाई ( जैसे पंडितों और ठाकुरों , ठाकुरों -ठाकुरों के बीच में लड़ाई )
और बहुत से कारन है जिन्हें बताने की जरूरत भी नहीं है . लेकिन इनसे भी जयादा परेशान करने वाली चीजें वो है जिसके कारन लोग इसका राजनीतक फायदा उठाकर समाज को तोड़ने की कोशिस कर रहे है , मैंने कहीं पढ़ा है , हर साल कुछ नीची जाति के लोग बौध धरम स्वीकार कर रहे हैं , कुछ लोग ईसाई धरम स्वीकार कर रहे हैं , मुझे इन धरम परिवर्तनों से कोई दिकत नहीं दिक्कत है तो सिर्फ वो कडुवाहट जो इसका कारन बन रहे हैं . और जो ये धरम परिवर्तन करवाते है वो इस जहर का फ़ायदा उठाते हैं . अब आप लोग समझदार हैं समझिये .
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धरम और जाति के ताबूत पर कील हम जैसे युवा गाड़ेंगे .
आज फिर मन किया थोडा जहर उगलें अरे डरिये नहीं, अरे ये जहर उनके लिए है जो अपने आप को कुछ ख़ास समझते हैं , एक भाई जान है मेरे घर के पास ही रहतें हैं पढ़े लिखे हुए हैं , इंजिनियर हैं अच्छी जगह काम करतें हैं कुछ हाँ में हाँ मिलाने वाले लोग भी हैं उनके इधर उधर , थोड़ी बड़ाई कर दो तो कहतें हैं अरे हम तो बस एक साधारण इंसान हैं , पर कई सारे काम करते हिचकते हैं कहतें हैं ये काम नहीं कर सकते , अरे उनकी इंजिनियर बॉडी पर सूट नहीं करेगा न , और धरम , जाति , और कई मुद्दे पर बेबाकी से कहतें है में ये सब कुछ नहीं मानता , पर क्या करून माँ , पिता जी को दुखी नहीं कर सकता , ऐसे लोगों से भरा पड़ा है हमारा समाज , कहने को सब समझते हैं पर कुछ नहीं समझते , अब दुसरे तरह के लोग हैं वो भी मेरे दोस्त हैं , उनसे बात करो की किस तरह धर्मों का स्वरुप कट्टरता को बढ़ावा देता और उन्हें उनके धर्म की गलतियां बतानें लगो तो इसे एक दम नकारते हुए वो लोग तुरंत मेरे धरम की कमियां गिनाना चालू कर देते हैं , जैसे की कभी किसी व्यक्ति से अपनी परेशानी की बात करो तो किस तरह वो अपनी परेशानिया बतानें लगता है और दुसरे की परेशानियों को नीचा दिखाने की कोशिश करता है , ये आदमी का स्वभाव है चाहे जितनी कोशिश कर लो वो अपना कमीना पन छोड़ने से साफ़ मना कर देता है मुझे लगता है लोग सच सुनना पसंद नहीं करते , हर जगह सभी गधे पन की बड़ी बड़ी मिशालें खड़ी करने में लगें हैं , हर कोई अपने गधेपन को दूसरे के गधेपन से ऊचा दिखाने में लगा है , अरे भाइयों पढ़े लिखे हो थोडा इंसानों जैसा बर्ताव करो , ये क्या हिन्दू मुस्लिम , ईसाई , पंडित, ठाकुर लगाए बैठे हो . चलो कोई बात नहीं हम जैसे युवा इस धरम ,जाति को ख़तम करके इसकी ताबूत में कील गाड़ेंगे . अब वो दिन दूर नहीं . साथ में आ जाओ वर्ना भविष्य तुम जैसे लोगों का स्वागत नहीं करता .
Monday, November 23, 2009
लोकतंत्र बनता गुंडा तंत्र
गांधी जी , सुभाष चन्द्र बोस , भगत सिंह जी जब हमारी आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे , तब उन्होंने सोचा भी नहीं था , की आज से पच्चास - साठ साल बाद उनके देश की ये हालत हो जाएगी की उनके बेटे -बेटी उनके नाम का इस तरह मजाक उड़ायेंगे . आज वो होते तो वो खूब फूट फूट के रोते . जिन्होंने अपनी हर एक स्वास , अपने शरीर के खून की एक -एक बूँद इस देश को बनाने में लगाई , आज उसकी बेटे - बेटी उसे तोड़ने में लगे हैं , बाला साहब ठाकरे को कौन समझाए की तुम जैसा सोचते हो , वैसे जिन्नाह भी सोचता था , अब तुम्हे सचिन महारास्त्र का भक्त नहीं लगता तो कोई बात नहीं क्योंकि वो देश भक्त है और उसने अपने देश को एक दो बार नहीं सैकड़ो बार गर्वित किया है , और तुम शायद भूल गए हो की मुंबई इस देश का ही एक हिस्सा है . वो क्रिकेट खेलता है , और उस जरिये से उसने देश की जो सेवा करी है उसका अंस मात्र भी तुम राजनीती में रहते हुए इस देश के लिए कर पाए हो तो बताओ , वर्ना अपना ये सडा मुह बंद रखो , अरे इतनी ही चिंता है महारास्त्र वासियों की तो विदर्भा भी तुम्हारे राज्य में आता है , उनके किसानो के लिए करो , अरे छोड़ो तुम तो अपने मराठी भाइयों के लिए भी कुछ नहीं कर पाए , मुझे शर्म आती है की गाँधी के देश में तुम जैसे कपूत हुए . अब मुझे लगता है लोकतंत्र का नाम तुम जैसे लोगों की वजह से गुंडा तंत्र रख देना चाहिए . आगे और भी ,............................................................................................................................................................................................
Saturday, November 21, 2009
आज फिर याद आया वो दिन
आज जब मैं टेलीविज़न देख रहा था , चैनल बदलते बलदते अचानक एक चैनल पे हाथ रुक गए , उस पर पिछले साल हुए मुबई आतंकवादी घटना पर एक छोटी फिल्म दिखा रहे थे , किस तरह उस मौत के तूफ़ान में भी लोग ऐसे साहस से काम कर रहे थे की मौत भी ठहर कर ये देखे की ये कौन लोग हैं जो मुझसे भी नहीं डरते , की किस तरह वे लोग फिर भी डटे रहे जब उनका कोई सबसे प्यारा उस मौत के तूफ़ान की भेट चढ़ गया , दिमाग में हमेशा यही की मेरे मासूम बच्चे ने किसी का क्या बिगाड़ा था . फिर भी वो औरों के बच्चो की जान बचाने में लगे थे , मेरे दिमाग में हमेशा यही रहता है की किस तरह मौत सब कुछ बदल देती है , किस तरह एक आदमी के लिए एक पल सब कुछ बदल के रख देता है , किस तरह वो जीने का मकसद ढूँढने लगता है , वो दर्द शायद मैं नहीं समझ सकता इसलिए समझ नहीं आ रहा की क्या लिखूं , पर में ये जरूर कहूँगा हमे ये नहीं भूलना चाहिए की एक माँ हमे नौं महीने पेट में रखकर जनम देती है , जब भी किसी भी कारन से किसी भी तरह से किसी की हत्या को सही ठहराए तो उनकी माओं के बारे जरूर सोचे , की अगर किसी माँ को ये मालूम हो की उसका बेटा , या बेटी किसी सनक के शिकार हो जायेंगे तो शायद वो उन्हें जनम देने से इंकार कर देती , अगर देखा जाये तो दुनिया में जितने युध हुए , दंगे हुए , नर सिंघार हुए वो कुछ आदमियों की सनक की वजह से थे कोई भी सही कारन नहीं था , धरम , जाती , नस्ल तो बस बहाने थे , मैं ये सब इसलिए कह रहा हूँ की अब बस बहुत हुआ , अब और बच्चे इस सनक का शिकार नहीं होंगे , हमे ये कसम खानी होगी की अब आवाज उठाएंगे उन सनकियों के खिलाफ , जो धरम जाती , छेत्र , भाषा , नस्ल को नफरत का जरिया बनाते हैं . ध्यान रहे ये सब जरिया हैं नफरत फ़ैलाने के असली जड़ खुद इसान ही है . हम अपनी नफरत को बहुत जल्दी कोई न कोई नाम दे देते हैं , अब हमे इस पर विचार करने की जरूरत है.a tribute to forgeeten souls .
Thursday, November 19, 2009
चलो एक नया धरम बनाते हैं
काफी दिन से कुछ लिखा नहीं था खुजली हो रही थी सोचा कुछ लिख दूं , चलिए क्योंकि ये ब्लॉग समाज , उसकी धर्मिक एवं जातीय मान्यताओं के बारे में मेरी सोच के लिए है , तो लीजिये बंदा हाजिर है कुछ अनसुलझे पहलू लेकर .मैं मनाता हूँ की ये पूरी दुनिया सांप्रदायिक है और जो इश्वर में विश्वास नहीं करते वो कोई और दायिक हैं . कुल मिला कर सब कहीं न कहीं फसे है बिडू , वैसे तो कहने को अभी का समय सबसे विकसित माना जाता है , पर मुझे लगता है की पहले के लोग काफी बुद्धिमान थे अब देखिये न बड़ा गेम खेला उन्होंने की अभी तक हम सब उसी में फसे हैं , "वो कहते हैं न पोथी पढ़ पढ़ जग मुया पंडित भया न कोय" वही हालत हम सब की है , किताबें तो हम सबने काफी पढ़ी हैं , अब तो नए नए साधन आ गए हैं , टेलीविज़न , इन्टरनेट , अखबार सभी से हमे नयी नयी जानकारी मिल रही है , हर आदमी अपने विचारों को प्रस्तुत कर रहा है , एक कंप्यूटर की तरह अपने अन्दर फीड डाटा निकाल रहा है , दोनों मैं कोई अंतर नहीं है उनकी अपनी कोई सोच नहीं है . या ख़तम हो रही है सोचने का काम तो उन पुराने ग्रंथों ने कर दिया न हजारों साल पहले , अब क्यों सोचना वैसे भी आदमी कितना आलसी होता है , है न ! अरे भाई जिन्दगी इतनी भी जटिल नहीं है की किताबें ये ग्रन्थ , ये कुरान ये बाइबिल पढ़ कर ही जिन्दगी चलेगी , जिन्होंने ये किताबें लिखी वो बुद्धिमान थे उन्होंने रास्ता दिखाया , पर उन्होंने इससे तो मना नहीं किया की अपना रास्ता न चुनो , इश्वर ये किताबें ये ग्रन्थ नहीं है , न ही इन किताबों में वो छमता है जो इश्वर को इतने छोटे दायरे मैं बाँध सकें .
अरे मेरे भाईओं अपनी अकल लगाओ , इश्वर तक पहुचना है तो एक दुसरे से प्रेम करना सीखो , लोगों की मदद करना सीखो , अपने आप को दायरे मैं मत बांधो , आदमी हो आदमी बने रहो जैसा इश्वर ने तुम्हे बना कर भेजा है . मैं सबसे आवाहन करता हूँ की आओ हम मिलकर एक नया धरम बनाते है , जो किसी नाम , भाषा ,रंग - रूप या छेत्र की मोहताज न हो . "वो कहते है न दिखावों पर मत जाओ अपनी अकल लगाओ "
अरे मेरे भाईओं अपनी अकल लगाओ , इश्वर तक पहुचना है तो एक दुसरे से प्रेम करना सीखो , लोगों की मदद करना सीखो , अपने आप को दायरे मैं मत बांधो , आदमी हो आदमी बने रहो जैसा इश्वर ने तुम्हे बना कर भेजा है . मैं सबसे आवाहन करता हूँ की आओ हम मिलकर एक नया धरम बनाते है , जो किसी नाम , भाषा ,रंग - रूप या छेत्र की मोहताज न हो . "वो कहते है न दिखावों पर मत जाओ अपनी अकल लगाओ "
Saturday, October 24, 2009
नक्सलवाद और गरीब जनता
आज कल नक्सलियों का आतंक मीडिया और पूरे देश में छाया हुआ है , सभी के दिलो दिमाग में ये है की कब इस गृहयुद्ध का अंत होगा , मैं नक्सलियों की विचारधारा को नहीं जानता, हाँ ये जरूर जानता हूँ की ये गरीबों और आर्थिक शक्तियों के किलाफ़ उनका आन्दोलन है , पर मुझे समझ मैं नहीं आ रहा की ये कैसे गरीब जनता के लिए करेंगे , इनके पास कुछ विचार हैं ये गरीबी को हटाने के लिए , की खाली लोकतंत्र और पूँजीवाद का सफाया ही इन्हें ये उपाय लगता है , मुझे कुछ समझ मैं नहीं आ रहा , वैसे मेरे नक्सली भाई अगर बुरा न माने तो मैं उनसे कुछ कहना चाहता हूँ . दरसल आज से कुछ ५० या ६० पहले एक व्यक्ति हुआ था , जर्मनी में जो ये समझता था की वो जिस नसल का है उसी नसल के लोगों को इस दुनिया पर राज करने का अधिकार है , क्योकि वो सबसे पवित्र नसल हैं , ऐसा करके वो दुनिया को शुद्ध करना चाहता था , और ऐसा वो दूसरी नस्लों को ख़तम करके कर सकता है कुछ हद तक उसने किया भी , करीब ५०,००,००० लोगों का कत्ले आम किया उसने , वो बुद्धिमान था और मह्त्वकांची भी ,वो आगे बढा ,लेकिन कहा जाता है न बुधि और शक्ति का जोड़ खतरनाक होता है , हिटलर के उदाहरण में यही हुआ , मेरी नजर में नक्सलियों की हालत भी वैसे ही है ,उनके जो नेता हैं उनके पास गलत बुधि आ गयी अब शक्ति भी आ रही है ,वो भी उसी राह पर देश दुनिया का भला करने निकले हैं , अगर गरीब जनता का भला करना ही है , तो उनका भला करो न ? और वो कैसे हो वो तो मालूम नहीं , जब हम अपनी तथाकथित युद्ध जीत जायेगे तब गरीबों के बारे में सोच लेंगे ,दरसल ये लडाई बस एक सनक है जो उन्हें कही नहीं ले जा रही , गरीबी तो इनसे हटने से रही जिस व्यक्ति का ये अनुसरण करते हैं उसके देश से गरीबी हट नहीं पाई और जिसका उस व्यक्ति ने पुरजोर विरोध किया आज वही ( पूँजीवाद )उस देश की शान बढा रहा है , मैं नहीं कह रहा की गरीबी हटाई नहीं जा सकती पर ये लोग गरीबी नहीं हटा सकते क्योकि ये इनके बस की बात नहीं है क्योंकि इन्हें मालूम ही नहीं है की गरीबी हटाई जाये तो कैसे ? अब गरीब जनता के सिपाही गरीब जनता को ही अपनी हिंसा का शिकार बना रहे है , और इसे युद्ध का नाम दे रहे हैं वाह रे नक्सलवाद !
Thursday, October 22, 2009
धरम ,जाति गई तेल लेने .
जब एक बच्चा पैदा होता है , तो उसे नही मालूम होता की वो किस धर्म , जाति का है , उसकी प्यारी सी मुस्कान हमे इश्वर कें बारे में सोचने पर मजबूर कर देती है , की इतना आदर्श निर्माण तो उस शक्ति का ही कोई कर सकता है , जब सभ्यताओं का निर्माण हो रहा था , तब कुछ बुद्धिमान लोगों ने लोगों को जीवन जीने के तरीके बताये और कहा की एक इश्वर है जो आप सब को बनाने वाला है ,वो सर्वसक्तिशाली है वो सब जनता है वो आपके दुखों को दूर करेगा , लोगों ने उन संतो की बात को सुना और आगे चल कर उन्ही संतो के उपदेशों पर आधारित धर्म बने , फिर उसमे समय समय पर परिवर्तन आए वो सही और ग़लत दोनों थे , ये देश ,समय , काल पर आधारित था , ग़लत लोगों ने ग़लत चीजें जोड़ी , सही लोगों ने सही चीजें । सदियों से वही परम्पराएं वैसे ही पालन हो रही थी , कारन उस समय पढ़े लिखे लोगों की कमी थी ,बाद मैं जब पढ़े लिखे लोगों की संख्या बड़ी तो उन चीजों पर सवाल उठने लगे ,तो यह कुछ लोगों को बर्दास्त नही हुआ , उन्हें लगा की उनसे कोई अनमोल चीज छीनी जा रही है , बजाय की आपस मैं बैठ कर बात करने के तरह तरह के विचार आने लगे ,सब अपनी सुविधा के अनुसार कह रहे थे । हम उस समय काल में जी रहे हैं , जहाँ लोग बीच में फसे हैं पूरी तरह पुराने भी नही हैं ,और नया स्वरुप भी उन्हें स्वीकार नही । में कहता हूँ क्या जरूरत है इन धर्मों की इन जातियों की , अब तो समाज और भी पढ़ा लिखा है , उसे अपने जीवन को कैसे जीना है पता है , जब हम किसी बच्चे के ऊपर किसी धर्म , जाति का तमगा लगा देते हैं , तो हम उसे हर उस दूसरी चीज से वंचित कर देते हैं जो दुनिया में हो रही हैं , क्यों नही हम उसे बिना किसी धर्म , जाति के तमगे से दूर रखकर अपना तरीका चुनने दे उसे क्या बनना है उसे चुनने दें , हाँ हम उसे सामन्य सही ग़लत बताएं पर खुला छोड़ दे उसे , और देखें की उनका अपना भविष्य किसी भी द्वेष , इर्ष्या से कैसे दूर हो रहा है .
सही ग़लत को जानें .
आज काफ़ी दिन बाद मन किया की चलो कुछ ब्लॉग पढ़ें , उन्हें पढ़कर मुझे पूरा यकीं हो गया की कलयुग इस वक्त सबसे जायदा प्रभावी है , क्योंकि सभी तरफ़ से उस दुनिया के विनाश की कोशिशें जारी हैं जो उनके रहनें की जगह है , सब कहतें की हम दुनिया बचायेंगे ,क्यूंकि उसका तीस मार खान नुक्ता तो हमारे पास ही है , और सब तो चूतिया हैं , और बात यहाँ ख़तम नही होती , अब दुनिया को बचने से पहले उन दूसरे विचारों को ख़तम भी तो करना है ,अब तरीका कोई भी हो , कोई मुसलमानों को सबसे बेहतर बताता है कोई इसाई को तो कोई हिंदू को , तरीका एक की ' खूब सारे जानकारियां जमा करो ,उनका खूब जोर शोर से प्रचार करो और सीधे साधे लोगों को बेवकूफ बनाकर उनमे दूसरे विचारों के लोगों के प्रति घृणा पैदा करो ' , सभी धर्मों के संगठन कमोबेस यही तरीका अपनाते हैं ।मसलन मान लीजिये की दो व्यक्ति जैसे की एक पंडित और दूसरा कोई नीची जाती के वक्ती के बीच में किसी मामूली से मसले पर विवाद हो जाता है , अब किसी को विवाद पैदा करना है तो बस दूसरे जाती के व्यक्ति के बारे में जातीय (घ्रिनात्मक ) इतिहास बताकर विवाद पैदा कर दिया , इस बात में कोई शक नही है की भारत जैसे असाम्प्रदायिक देश में कई सारी ऐसे बातें हैं जो साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देती हैं , पर इसका हल आपस में लडाई नही , क्या हम पाकिस्तान या और मुस्लिम या किसी इसाई रास्त्र की तरह होना चाहते हैं , ये समय हमारे लिए मुश्किलों भरा जरूर हो पर हम सही रास्ते पर हैं । आप सभी से मेरा अनुरोध है की कृपया सही और ग़लत में फर्क समझें ।
धन्यवाद .
धन्यवाद .
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