Friday, August 28, 2009

रोष

आज मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है ,पता नही की यही गुस्सा मेरे जैसे युवाओं में यही गुस्सा है की नही ? पर मुझे ये कोई बताये की ये किसने कहा की "पढोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब खेलोगे कूदोगे बनोगे ख़राब " ये किस कुत्ते कमीने ने बोला था , अगर वो आज जिन्दा होता तो में उसे जान से मार देता । आज जो पूरे समाज की दशा हो गई है यही कारन है मेरे पूरे कालोनी में कोई भी ढंग का ग्राउंड नही है जिसमे बच्चे खेल सकें , हम अपने बच्चो को क्या सिखा रहे हैं , हमने खेल को खेल ही समझा इसी वजह से ओलम्पिक्स में हमारा प्रदर्शन जह जाहिर है , भारतीय होते मुझे इससे इतनी शर्म आती है की कभी कभी सोचता हूँ की में किस देश में पैदा हो गया , जहाँ लोग जाति , धर्म जैसे निहायती निक्रिस्ट चीजों पर ही ध्यान है , अरे सेक्स तो यहाँ सबसे बड़ा पाप है जैसे की १ अरब जनसँख्या क्या ऐसे ही हो गई , मेरा बेटा , बेटी कहीं बिगड़ न जाए ये सबको डर है , उन्हें यही नही पता की सबसे बिगडे तो ये ख़ुद हैं , सेक्स करना है तो शादी के बाद करो , मैं पूछता हूँ की जब ये शादी के बाद ग़लत नही तो शादी के पहले कैसे ये ग़लत कैसे हो सकता है , अरे जब सेक्स इतना ही ग़लत है तो तो १० -१० बच्चे क्यों पैदा किए बैठे हो , तब तो ये एंजोयमेंट की चीज हो जाती है क्या करें और कुछ है नही न , तो बीबी ही सही ! पर बच्चे वही एंजोयमेंट पाने की कोशिस करें तो ग़लत । हमें ये मान लेना चाइए की हम एक दोगले विचारों वाले देश मैं रह रहे हैं , और अब आती है बारी हमारे महापुरषों की यानि हमारे पूर्वजों की मैं मानता हूँ की वो एक नम्बर के गधे थे , यार तुमने कोशिस क्यों नही की इन सब चीजों को हटाने की। मानता हूँ की आम लोग बेवकूफ होतें पर तुम तो बुद्धिमान थे । मैं सभी लोगों से ये अनुरोध करता हूँ की मेरी लिखी गई बातों पर गौर करें ।
धन्यवाद

Wednesday, August 5, 2009

उलझन


आज कल कहीं मन नही लगता , बस यूँ ही घूमता रहता है , यही सोचता रहता है की क्या सपने सच होते हैं , "मेरे सपने " । बचपन में देखे बिना किसी रोक टोक के सपने , वो उड़ने की ख्वाहिश , उछल कर आसमा को चूम लेने की ख्वाहिश , बादलों के बीच घर बनाने की तमन्ना , जब छोटे थे तो बड़े बनने का बड़ा मन करता था , बड़े होकर सपने जो पूरे करने थे , तब लगता था की सब चीज कितनी अच्छी है , सुंदर है , बिना बात के हँसना , रोना , गुस्सा होना , भाई , बहनों , दोस्तों से लडाई करना , फिर मनाना , फिर सब कुछ भुला के फिर से खेलना , वो बारिश , वो कागज़ की नाव, एक टॉफी ही दिल खुश कर देती थी , पहले खुशी ही जिन्दगी थी अब जिन्दगी में खुशी दूंदते फिरते हैं , सपने नॉन प्रैक्टिकल लगते हैं , उड़ने की कौन कहे चलने में डर लगता है , बड़े होकर भी अब बच्चा बनने का मन करता है .